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भारतीय चित्रकला का दार्शनिक आधार क्या है ?

कला संस्कृति का ग्रन्थ है

कला संस्कृति का ग्रन्थ है | और सभ्यता का श्रृंगार है | कला ने संगीत को मधुरता प्रदान की है | नीति को शोभा का वरदान दिया है | पत्थरों और कठोर वस्तुओं को तराश कर उन्हें जीवंत किया है | भाषा को भावों से भर दिया है |

कला ने नृत्य में थिरकन ,आवाज़ में सम्मोहन , रेखाओं में प्रवाह का लावण्य और रंगों को बोल उठने की क्षमता प्रदान की है | यही नहीं कला ने मानव को जीवन जीना सिखाया है | जिससे वह निरंतर नवीनता  का निर्माण  सृजन और विश्व को  समृद्ध बनाया है | अस्तु |

दार्शनिक आधार

जहाँ तक कला के दार्शनिक आधार का प्रश्न  है  वहां सर्वप्रथम  दर्शन क्या है तो प्रसांगिक होगा | संक्षेप में  दर्शन मानव लक्ष्य की मीमांसा करते हुए सत्य का अन्वेषण करता है | अतः किसी भी विषय का दर्शन, तत्त्व, विषय तथा मानव की आत्मा से तादातम्य अर्थात साध्य और साधन के मध्य अद्वैत स्थापित करने पर बल देता है |

दार्शनिक के विचारों से  श्रुति से स्मृति से तथा आप्त वचनों से आत्मा का सिद्ध होना ध्रुव सत्य है | जिसे कोई भी भारतीय  आध्यात्मिक विचारधरा का व्यक्ति नहीं नकार सकता | इसी आत्मा को हम कला की दृष्टि से भी सार सत्य या तत्त्व संज्ञा प्रदान कर सकते है | कला दर्शन का प्रमुख लक्ष्य किसी भी कला कृति का तात्विक  विश्लेषण  करना है |

यदि किसी कलाकृति के विषय में उसका सत्य पूंछा जा तो इस प्रश्न का उत्तर देना ही कला का तात्विक दर्शन है | कला की भाषा को दर्शन की दृष्टि से भी पूंछा जा सकता है | आत्मा का तत्व बोध वैदिक ऋषियों की अपनी अनुभूति ही थी | कालान्तर में यही अनुभूति  शनैः-शनेः क्षीण होती गयी | तर्क शास्त्रियों ने अपनी तार्किक मीमांसा से इस अनुभूति को और भी उलझा दिया | आज हम इतना ही कह सकते ही कि जो जड़ अर्थात स्थूल जगत एवं प्रकृति हमें अपने चारों और दृष्टिगोचर होती है | समझने की दृष्टि से उसके दो छोर या पहलू मान सकते है |

सत्यम शिवम् सुन्दरम कीअवधारणा

पं राज जगन्नाथ के अनुसार  -चित्र का आत्मा से परस्पर सम्बन्ध है  चित्र की उत्पाती सत्य से होती है  जिसे हम आनंद कहते है | इसीलिए  आत्मा को सत=चित=आनंद कहते है | इसीलिए सत्य चित्त युक्त होता है | आत्मा सत्य है | और सत्य ही प्रिय है|  और प्रिय में ही आनंद  होता है | सुन्दर मन में शुभ और कल्याण की अनुभूति भर देने की सामर्थ्य रखता है | यही शिव की अनुभूति है |  इस प्रकार सत्य शिव सुन्दर है | ये तीन आत्मा की भंगिमाएं है | और इससे भारतीय कला में  सत्यम शिवम् सुन्दरम कीअवधारणा सिद्ध होती है |

आनंद का अनुभव

मानव सदा से ही सत्य की खोज में जूझता रहा है | शुभाशुभ में विभेद करते ही उसका जीवन गतिशील है | मानव ने अशुभ और असुन्दर कभी पसंद नहीं किया | यही मानव का अध्यात्मिक स्वभाव है | सुन्दर और शुभ आत्मा मात्र है | अतः मानव सदैव ही आत्मस्थिति में पहुचना चाहता है | कला मानव को इस कार्य में येन केन प्रकारेण सहयता करती है | कला में भावो पर बल दिया जाता है | इस तरह कला में भावों को प्राण मानना  असंगत नहीं है | 

यदि रचनाकार की रचना में दर्शक रस का आस्वादन नहीं कर पाता तब वह रचना असफल मानी जाती है |और जिससे दृष्टा का चित्र में भावानिवेश हो अर्थात यही भावों में अपने व्यक्तित्व को भुलाकर चित्र के साथ तादातम्य  स्थापित करने की प्रक्रिया रसास्वादन कहलाती है | अरूप भावों को कुपित करना कलात्मक सृजन कहलाता है | इस सृजन में हम नवीनता , आश्चर्य, तथा आनंद का अनुभव करते है |

सभी कलाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करने के लिए कलाकार चेतन और अर्धचेतन  प्रयास करता है | हम कला अथवा सृजन के  माध्यम से अपने व्यक्तित्व के ऊपर लादे हुए भारो तनावों एवं उलझनों  से ऊपर उठने का प्रयत्न करते है | यदि कलाकार और कलारसिक दोनों में से कोई भी ऐसा नहीं कर पाता तो वह निश्चय ही सच्ची अनुभूति से वंचित रहता है |

वेदान्त में प्रत्यक्ष का विधान यह है कि दृष्टस्वाम ही दृश्य बन जाता है | श्रुति  कहती कि विष्णु होकर विष्णु की उपासना होती है | उक्त कथन की पुष्टि  शंकराचार्य “ अहम् ब्रह्मास्मि” सूत्र से करते है | कला के सन्दर्भ में भी उक्त सूत्र लिया जा सकता है | कि किसी कलाकृति का रसास्वादन  तभी संभव है जब कला का उपासक बन उसका आस्वादन किया जाए | अतः कला को हम उपास्य और उपासक का ही एक रूप मान सकते है |

भारतीय दर्शन की मान्यताओं के अनुसार यहाँ सब कुछ जीवंत है | ज्योतिर्मय है |

कलाकार तो पत्थर रंग  और मिटटी ,तथा काष्ठ आदि सभी में सौन्दर्य के दर्शन करता है | यदि आपके पास कलाकार की आँखें है तो आप शिलाखंड की कठोरता में कोमलता , मिटटी में निर्माण तथा काष्ठ में उसके स्वरुप को देख सकते है | कलाकार जब अपने आत्म कौशल को अपनी कलाकृति के माध्यम से अपनी कृति में अभिव्यक्ति करता है |  तो उसकी उस अभिव्यक्ति को हम प्रत्यक्ष प्रकटीकरण कह सकते है | अतः इसमें सत्यम शिवम् सुन्दरम  की अनुभूति होती है | कृति की कलात्मकता का यही मापदंड है कि उसमे चैतन्य का प्रस्फुटन कब तक है |

मानव मन भावनाओं से ओत – प्रोत होता है | मानव मन की यह असम्पदा असीमित है | यही मनाव का श्रोत है  | इसकी मार्मिक अभिव्यक्ति उसकी कलाकृति में होती है | भारतीय कल की समय दृष्टि में कला समाज की अभिव्यक्ति ,वातावरण की उपज और भविष्य की संभावना  ही नहीं वरन मानवता का निर्माण भी करती है | यही भारतीय कला दर्शान की मान्यता रही है |

    One thought on “भारतीय चित्रकला का दार्शनिक आधार क्या है ?

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