भारतीय चित्रकला का इतिहास

19 Aug 2020 By laqueerblog 0

वात्सायन ने अपने ग्रन्थ कामसूत्र में 64 कलाओं की गणना की है जिनमें चित्रकला का भी स्थान है. चित्रकला का महत्त्वपूर्ण अंग है चित्र विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्र सकल कलाओं में श्रेष्ठ कहा गया है और उसे धर्म, अर्थ, काम आतता मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदाता भी माना गया है –

कलानां प्रवरं चित्रं धर्मकामार्थमोक्षकम् अतएव चित्र का इससे बड़ा उद्देश्य और इससे बड़ी प्रशंसा और कौन हो सकती है? समरांगणसूत्रधार (भारतीय वास्तुशास्त्र से सम्बन्धित ज्ञानकोशीय ग्रन्थ) में भी लगभग इसी प्रकार से चित्र का वर्णन किया गया है – 

“चित्रं हि सर्वशिल्पानां मुखं लोकस्य च प्रियम्”.

प्रागैतिहासिक काल

भारत में चित्रकला की परम्परा बड़ी पुरानी है, प्रागैतिहासिक काल से ही भारत में चित्रकला के अस्तित्व के साक्ष्य पाए गये हैं| मनुष्य जब आदिम अवस्था में था और गुहा जीवन अथवा वन्य जीवन व्यतीत कर रहा था, तभी से उसमें चित्रकला के प्रति रुझान था , उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की अनेक प्रागैतिहासिक गुफाओं से तत्कालीन मनुष्यों के बनाए चित्र पाए गये हैं , उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर जिले के अंतर्गत तथा मध्यप्रदेश में पचमढ़ी, सिंहनपुर, रायसेन, होशंगाबाद आदि अनेक स्थानों से गुफाओं अथवा शिलाओं पर अंकित चित्र पाए गये हैं. होशंगाबाद के निकट भीमबेटका नामक स्थान पर लगभग 600 चित्रित गुफाएँ मिली हैं | ये चित्र विषय, शैली तथा सामग्री की दृष्टि से तत्कालीन मानव-जीवन के प्रतीक हैं. इनके मुख्य विषय वन्य पशुओं का आखेट, आपस में युद्ध करते हुए मनुष्य अथवा उनके धार्मिक अनुष्ठान या पूजा की आकृतियाँ हैं. ये चित्र प्रायः धातुरंगों (गेरू, रामरज आदि) से तीन प्रकार से अंकित किये गये थे  1.केवल दो-तीन रेखाओं द्वारा बनाई गई आकृतियाँ जिनमें चौड़ाई या मोटाई नहीं है. 2.चौड़ी आकृतियाँ जिन्हें रेखाओं से भरा गया है तथा 3.चौड़ी आकृतियाँ जिनका सम्पूर्ण अथवा कुछ भाग पूरी तरह रंग से भरा है और शेष भाग में रेखाएँ हैं. लाल रंग से बनाई जाने के कारण स्थानीय लोग इन्हें “रक्त की पुतरियाँ” (रक्त-पुत्तलिका) कहते हैं|

आद्यैतिहासिक काल

भारतीय चित्रकला की परम्परा का अगला चरण आद्यैतिहासिकाल है | इस काल में सिन्धु घाटी की उपत्यका में एक अति विकसित सभ्यता विद्यमान थी. इस सभ्यता के विविधपक्षी अवशेष प्रारम्भ में हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से मिले थे , अब तक इस सभ्यता के अवशेष रंगपुर, लोथल, अतरंजीखेड़ा तथा आलमगीरपुर आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हो चुके हैं. इस सभ्यता में अन्य सामग्री के साथ मिट्टी के बर्तनों के अंसख्य टुकड़े भी मिले हैं जिन पर काले या सफ़ेद रंगों के चित्रांकन पाए गये हैं. ये बर्तन पूजा-अनुष्ठान में तो काम आते ही थे, नित्य-प्रति के उपयोग में भी लाये जाते थे और मृतक के साथ दफनाये भी जाते थे. इससे स्पष्ट होता है कि उस काल के मनुष्य कितने कलाप्रेमी थे. कला उनके जन्म-मरण की संगिनी थी. आद्यैतिहासिक पात्रों के चित्रांकन में ज्यामितिक आकृतियाँ जैसे सरल टेढ़ी रेखाएँ, कोण, वृत्त आदि विशेष हैं. इनके अतिरिक्त फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षी तथा मानव आकृतियाँ हैं |

ऐतिहासिक काल

भारतीय ऐतिहासिक काल की चित्रकला आज संसार भर में प्रसिद्ध है. इस प्रसिद्धि का कारण अजंता की चित्रकला है | द्वितीय शताब्दी ई.पू. से भारतीय चित्रकला के अवशेष हमें अजन्ता की गुफाओं में मिलने लगते हैं जहाँ पर परम्परा का क्रमिक विकास सातवीं शताब्दी ई. तक होता रहा | अजन्ता के अतिरिक्त बाघ, बादामी, औरंगाबाद, सित्तन्नवासल आदि स्थानों से भी भारतीय चित्रकला के साक्ष्य पाए जा गए हैं |

मध्यकाल

मध्यकाल से भारत में चित्रकला लघुचित्रों में सिमट गई , पुर्स्त्कों के पृष्ठों पर भाँति-भाँति के विषयों तथा कथानकों का चित्रण किया जाने लगा , आगे चलकर लघु चित्रांकन (मिनिएचर पेंटिग) के रूप में चित्रकला की अनेक शैलियाँ लोकप्रिय हो गयीं जिनमें पहाड़ी, शैली, राजस्थान शैली तथा मुगुल शैली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. पिछले सौ-सवा सौ सालों से जब से हमें अजंता की चित्रकला की जानकारी मिली है भारतीय चित्रकला का पुनर्विकास हुआ है. बंगाल के कई चित्रकारों ने अपनी पुरानी परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है | इनमें अवनींद्रनाथ टैगोर, असितकुमार हलदार, नन्द लाल बोस , यामिनीराय, राजा रविवर्मा, फिदाहुसेन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इस प्रकार  भारतीय चित्रकला की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से आज तक अक्षुण्ण रही है |

साहित्यिक साक्ष्य

भारतीय चित्रकला के प्रकांड विद्वान् रायकृष्णदास के अनुसार ऋग्वेद (1/145) में चमड़े पर बने अग्नि के चित्र की चर्चा है. पाणिनि के द्वारा स्नाघ राज्यों के लक्षणों की चर्चा से भी अनेक पशु-पक्षी, पुष्प अथवा नदी-पर्वत आदि के चिन्हों को अंकित किये जाने का संकेत मिलता है. बौद्धकाल अर्थात् छठी शताब्दी ई.पू. से चित्र और चित्रकला के स्पष्ट उल्लेख मिलने लते हैं. उस युग में चित्रकला अत्यंत लोकप्रिय थी. इसका आभास बौद्ध भिक्षुओं को दिए गये उस आदेश से मिलता है जिसमें उन्हें चित्रकला से विमुख रहने को कहा गया था. विनयपिटक तथा थेरी-थेरी गाथा में चित्रों का उल्लेख मिलता है. महाउम्म्ग्ग जातक में चित्रशालाओं तथा चित्र-रचना के विविध निर्देश प्राप्त होते हैं. कालिदास के रघुवंश में उजड़ी अयोध्यापुरी का वर्णन है जिसकी भित्तियों पर बने चित्रों में पद्म-सरोवर के क्रीड़ा करते हुए हाथियों का मनोहर अंकन था. मुद्राराक्षस में चित्रपटों का तथा कामसूत्र में चित्रकला की सामग्री का उल्लेख है. इसके अतिरिक्त विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अंतर्गत चित्र-सूत्र नामक अध्याय में तथा सोमेश्वरकृत मानसोल्लास के अंतर्गत अभिलषितार्थ चिंतामणि नामक अध्याय में चित्र, चित्रांकन तथा चित्र-सामग्री का विस्तृत वर्णन है. भारतीय चित्रकला के स्फुट साक्ष्य महावंस, हर्षचरित, कादम्बरी, उत्तररामचरित आदि ग्रन्थों में भी मिलते हैं. जैन ग्रन्थों में चित्रों के अनेक रूप पाए गये हैं.

भारतीय चित्रकला के प्रकार

इसी एक तल अथवा सतह पर पानी, तेल अथवा चर्बी में घोले गये अथवा सूखे रंगों से किसी आकृति के अंकन का चित्रण और उस अंकित स्वरूप को चित्र कहते हैं. ऐसा चित्रण भवन की भित्ति, प्रस्तर-फलक, काष्ठ, मिट्टी के बर्तन, चर्मपट, तालपत्र अथवा वस्त्र या कागज़ पर किया जा सकता है. भारतीय चित्रकला मोटे तौर पर चार प्रकार की जा रही है –

भित्ति चित्र – अजंता, बाघ, बादामी तथा सित्तन्नवासल की गुहा-भित्तियों पर इसके उदाहरण मिले हैं.

चित्रपट – चमड़े अथवा कपडे के टुकड़ों पर की गई चित्रकारी जिसे लटकाया जाता था.

चित्र फलक – पत्थर, धातु अथवा लकड़ी के टुकड़ों पर किया गया चित्रांकन.

लघु चित्र – बाद में पुस्तकों के पृष्ठों पर अथवा छोटे-छोटे कागज़ या वस्त्रों के टुकड़ों पर बनाए गये चित्र उन्हें प्रायः मिनिएचर पेंटिग कहा जाता है |

चित्रांकन के प्रयोजन

प्रागैतिहासिक तथा ऐतिहासिक चित्रों और साहित्यिक विवरणों के आधार पर भारतीय चित्रांकन के मुख्य प्रयोजन निम्नलिखित बताये जा सकते हैं –

धार्मिक अभिव्यक्ति, पूजा-पाठ आदि , ऐतिहासिक दृश्यों का संरक्षण , जीवन की प्रमुख घटनाओं का संरक्षण, मृत व्यक्तियों की आकृतियों का संरक्षण , रसों का उद्यीपन और प्रेमाभिव्यक्ति , भवनों, राजमहलों तथा मंदिरों का अलंकरण |

चित्र के अंग

आम्सूत्र के लब्ध प्रतिष्ठ टीकाकार यशोधर ने चित्र के अंगों का निम्नलिखित वर्णन किया है –

रुपभेदा: प्रमाणानि लावण्यं भावयोजनम् |

सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रं षडंगकम् ||

अर्थात् रुपभेद, प्रमाण, लावण्य , भावयोजना, सादृश्य तथा वर्णिकाभंग ये चित्र के छह अंग हैं.

रूपभेद – भिन्न-भिन्न चित्रों में भिन्न-भिन्न रुप.

प्रमाण – अंग-प्रत्यंग की सही नाप तथा सही अनुपात.

भावयोजना – करुणा, शांति, हास्य, प्रसन्नता आदि भावों का यथास्थान अंकन.

लावण्य – सौन्दर्य या सुन्दरता.

सादृश्य – जिस व्यक्ति अथवा वस्तु का चित्र हो उसी की भाँति चित्र का दिखाई देना.

वर्णिकाभंग – यथास्थान समुचित रंग भरना.

लावण्य कला का प्राण है. भाव-योजना से चित्रकला काव्य के समान रसास्वादन कराती है. सादृश्य में निष्णात कलाकार के कौशल का मर्म छिपा है. इसी प्रकार वर्णिकाभंग में चित्रकार के रचना-चातुर्य पर संकेत है |

कला के प्रकार

ज्यादातर जिस वस्तु, रूप अथवा तत्त्व का निर्माण किया जाता है, उसी के नाम पर उस कला का प्रकार जाना जाता है, जैसे –

वास्तुकला या स्थापत्य कला – अर्थात् भवन-निर्माण कला जैसे दुर्ग, प्रासाद, मंदिर, स्तूप, चैत्य, मकबरे आदि.

मूर्तिकला – पत्थर या धातु के बनी मूर्तियाँ.

चित्रकला – भवन की भित्तियों, छतों या स्तम्भों पर अथवा वस्त्र, भोजपत्र या कागज़ पर अंकित चित्र.

मृदभांडकला – मिट्टी के बर्तन.

मुद्राकला – सिक्के या मोहरें.

कभी-कभी जिस पदार्थ से कलाकृतियों का निर्माण किया जाता है उस पदार्थ के नाम पर उस कला का प्रकार जाना जाता है, जैसे –

प्रस्तरकला – पत्थर से गढ़ी गई आकृतियाँ

धातुकला – काँसे, तांबे अथवा पीतल से निर्मित मूर्तियाँ

दंतकला – हाँथी के दांतों से बनाई गई कलाकृतियाँ

मृत्तिका कला – मिट्टी से बनाई गई कलाकृतियाँ या खिलौने

मूर्तिकला भी अपनी निर्माण शैली के आधार पर दो प्रकार की होती है जैसे –

मूर्तिकला – जिसमें चारों तरफ से तराशकर मूर्ति को एक विशिष्ट रूप दिया जाता है. ऐसी मूर्तियों को आगे, पीछे या चारों ओर से देखा जा सकता है |

उत्कीर्ण कला अथवा भास्कर्य कला – इसके अंतर्गत पत्थर, चट्टान, धातु अथवा काष्ठ के फलक पर उकेर कर रूपांकन किया जाता है. किसी भवन या मन्दिर की दिवार, खम्भे अथवा भीतरी छत पर उत्कीर्ण मूर्तियों का केवल अग्रभाग ही देखा जा सकता है |

हाई रिलीफ (High Reliefs) – इसके अंतर्गत आकृति को गहराई से तराशा जाता था ताकि आकृतियों में ज्यादा से ज्यादा उभार आ सके और वे जीवंत हो सकें |

लो रिलीफ (Low Reliefs) – इसमें आकृति को हल्के से तराशा जाता जाता जो आकृति में चपटापन लाता था |

कला का महत्त्व

विचारों का आदान-प्रदान मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्ति रही है. इसी प्रवृत्ति के फलस्वरूप मनुष्य द्वारा बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं का जन्म हुआ. परपस्पर बोलकर या बातचीत करके विचारों का आदान-प्रदान करना संभव है. परन्तु एक क्षेत्र/देश की भाषा जब दूसरे क्षेत्र/देश की भाषा से जब अलग होती है तो वे दोनों क्षेत्र आपस में विचारों का आदान-प्रदान करने में असक्षम हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में भाषा के ज्ञान के बावजूद मनुष्य के विचारों का सार्वभौमिक आदान-प्रदान असंभव प्रतीत होता है |

भाषा की इस कमी को कला पूरा करती है. मनुष्य ने अपने मन में उठने वाले विचारों को कला के जरिये जो साकार या मूर्त रूप प्रदान किया, वह देश-काल की सभी सीमाओं को पार कर के सभी के लिए समान रूप से ग्रहण कर लिया गया. चित्रकला या मूर्तिकला में अंकित पशु-पक्षी, फूल-पत्ते आदि संसार के किसी कोने में बैठे व्यक्ति को उसी प्रकार रोचक प्रतीत होता है जैसा किसी अन्य स्थान में बैठे व्यक्ति को. लोग विभिन्न कलाकृतियों में समाविष्ट विभिन्न भावों – हास्य, उल्लास, क्रोध, दुःख – से सहज रूप से परिचित हो जाते हैं| इस प्रकार विचारों के आदान-प्रदान हेतु जहाँ मनुष्य की भाषा का प्रभाव-क्षेत्र सीमित है, दूसरी ओर कला का प्रभाव-क्षेत्र असीमित है और समान रूप से ग्राह्य है |