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शिल्प और कला

कला और शिल्प एक दुसरे के पूरक हैं | इन दोनों के मध्य सुगमता से अंतर नही किया जा सकता है | यह अंतर करना उतना ही कठिन हैं जितना कि सच और झूठ या शुभ और अशुभ | कला और शिल्प को एक दूसरे का परस्पर पूरक मान लेना ही तर्क सांगत है |

कलाएं कई प्रकार की होती हैं |६४ कलाओं का उल्लेख तो पौराणिक है आज के कला वेत्ता लगभग १०० प्रकार की कलाओं का आस्तित्व स्वीकार करते हैं किन्तु यंत्र चित्रकला और शील का सम्बन्ध ही प्रासंगिक है | यह भी जान लेना आवश्यक है कि कला और शिल्प में जो भी अति सूक्ष्म अंतर है वह क्या है यद्दपि जनसामान्य में कला का अर्थ शिल्प ही है |

विद्वानों का मत है कि मानव जाति का एक अत्यंत महत्त्व पूर्ण अंग कला है अतः चित्रकला प्राचीन ही नही सार्वभौमिक भी है | मानव को कला से कला को मानव से प्रथक नही किया जा सकता है | चित्रकला का अर्थ अत्यंत व्यापक है | मानव की सभी क्रियाएं अथवा मानव निर्मित सभी वस्तुएं कलात्मक भाव जाग्रत नहीं करती | इस प्रकार की वस्तुएं कला के अन्तरगत नही आती हैं | कुछ विद्वान् कला को कौशक की श्रेणी में रखते हैं | सुन्दर रूप का निर्माण भी एक क्रिया है | संज्ञान नहीं है | इस प्रकार केवल नियमों के आधार पर ही कौशल अथवा  कारीगरी का प्रदर्शन मात्र कला नहीं है वरन कला एक मानसिक क्रिया भी है | कला का अर्थ “कं लाति” अर्थात आनंद देने वाली कृति भी होता है | कला में हम जीवन की  अनुकृति का आधार लेकर चलते हैं | मूर्तिकला नाट्यकला चित्रकला इत्यादि में हम उन्ही विषयों का चयन करते हैं जो हमें समग्र वातावरण में चारो और दृष्टिगोचर होते हैं | इसी प्रकार कलाकार लगभग सभी कलाओं में अनुकृति का सहारा लेता है |

मध्यकाल में कलाओं को मानसिक क्रिया से सम्बंधित मान लेने के कारण केवल बाहरी कुशलता पर बल देने की भावना कम होने लगी | कला को कल्पना के सहयोग से नवीन सृष्टि और आतंरिक अनुभूति को अभिव्यक्त करने वाली क्रिया माना गया | कला में कल्पना अनिवार्य होती हे | यद्दपि कला अभिव्क्तात्मक होती है किन्तु प्रत्येक अभिव्यक्ति कला नही होती है | जिस अभिव्यंजना में आतंरिक भावों का प्रकाशन अथवा कला का योग रहता है वाही कला है | कला अभिव्यक्ति के साथ सृजन भी है किन्तु प्रत्येक सृजन कला नही होता | मानव जो सृजन यांत्रिक विधि से करता है वह सृजन नही है इस प्रकार कला में अभिव्यंजना अनुकृति सृजन कल्पना आदि विशेषताओं का योग रहता है अतः कला एक संश्लिष्ट क्रिया है | उपरोक्त विवेचन का आशय यह है कि मानव की वह मानसिक क्रिया जिसमे मानव भावोद्द्रेक की अभिव्यक्ति चिर्तों के माध्यम से करता है | कला में अनुकृति कल्पना और अभिव्यक्ति के हेतु जिस सामग्री का प्रयोग करता है उस सामग्री का अपना अलग महत्व होता है | कला कार उस सामग्री को विशेष विधि से संयोजित करता है | इस संयोजन के कारण कला एक कृति में परिवर्तित होती है | संयोजन की यही कुशलता शिल्प कहलाती है | यद्दपि परंपरागत अर्थों में शिल्प और कला में कोई अंतर नही है | किन्तु फिर भी जो अंतर है वह शिल्प की निम्नलिखित विवेचना से स्पष्ट हो सकता है | 19 वीं शती से पूर्व शिल्प और कला में भेद नही किया जा सका था | बल्कि शिल्प व् कला में भेद करने के प्रयास चल रहे थे | 19 वीं शती में उपयोगी कार्यों के साथ कला शब्द का प्रयोग समाप्त कर दिया गया | अस्तु|

शिल्प की विशेषताओं को इस प्रकार दिया जा सकता है कि

@ शिल्प में रचना प्रिक्रिया होती है | निर्माण के समय शिल्पी को सामग्री पर की जाने वाली क्रिया के विषय में पूर्ण निश्चित जानकारी होती है | शिल्पी यह पहले से ही जनता है कि उसे क्या बनाना है |

@शिल्प के अंतर्गत सदैव साधन और साध्य का भेद रहता है |

@शिल्पी अपने शिप द्वारा कच्ची सामग्री को उपयोग में परिवर्तित कर देता है | अतः उपादान क्रिया होती है |

@ शिल्प में अनेक व्यक्ति परस्पर आश्रित रह कर कार्य कर सकते हैं |

@ शिल्प मूर्त हैं |