कला और परंपरा

परंपरा का अर्थ बहुत ही लचीला होता है | इसमें रूढ़ियों एवं अन्ध विश्वासों का कोई स्थान नही होता है | जिस प्रकार शताब्दियों तक निरंतर विचारों के मंथन से संस्स्कृति का विकास होता है उसी प्रकार परंपरा पीढ़ी दर पीढी के अनुभवों का संचित कोष है | इसमें विकास एवं प्रगति का तत्व अनिवार्य है | अतः परंपरा सदीव जागरूक होती है | यह वर्तमान के साथ प्राचीन का समन्वय करके चलती हैं | जो वर्तमान आवश्यकतानुसार और प्राचीन पर आधारित होती है किन्तु यह रीति से पूर्णतः भिन्न है | रीति में रूढ़ियों को स्थान मिलता है अतः रीतिबद्ध कलाकारों की सभी कृतियाँ एक ही पद्धति पर आधारित होती हैं | उनमे कोई विश्वास नही होता है | इसलिए पश्चिमी देश परम्पराओं के अभाव में सांस्कृतिक क्षेत्रों में यूरोप पर निर्भर हैं | वहीँ भारत चीन जापान एवं यूरोप आदि के पास अपनी समृद्ध परम्पराएं हैं |

कला में परम्परागत प्रतीक चिन्हों का बहुत महत्त्व होता है | कला में जिन रूपों का प्रयोग होता है वे दर्शकों की समझ में तभी आते हैं जबकि वे पहले से प्रचलित रहे हों | इस प्रकार के रूप परम्परागत प्रतीक चिन्ह कहलाते हैं | डॉ. आनंद कुमार स्वामी के मतानुसार इन्ही प्रतीक चिन्हों के द्वारा कला का सम्प्रेषण होता है | जब ये प्रतीक चिन्ह रूधि बन जाते हैं तो पतित कला का जन्म होता है  क्योंकि परम्परा के आधार पर बनायी गयी अपूर्ण कृति को भी प्राचीन बिम्बों के अनुसार ही देखा जाता है किन्तु कलाकृति को देखने में दर्शक अभ्यस्त नही होता है | कला में केवल प्रतीक नही होते , और जिन प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है उनका परम्परागत अर्थ नही होता है | समय के अनुसार यथार्थ का दृष्टिकोण बदल जाने से उसमें नए अर्थों का समावेश भी हो जाता है  | यूरोप की कलाओं में पूर्ववर्ती परम्पराओं में अनेक अर्थों का समावेश किया है | यह अर्थ ईसाई चित्रकला में परिलक्षित होते हैं |

इस प्रकार परम्परा केवल अतीत का वर्तमान में संक्रमण ही नही है बल्कि परम्परा का अर्थ निरंतरता एवं  परिवर्तन होता है | हमें जो कुछ भी विरासत में मिला है उसमे से जो कुछ भी वर्तमान के सन्दर्भ में प्रासंगिक है वाही ग्रहण किया जाता है | अतः परम्परा का सदैव मूल्यांकन होता रहता है |

परम्परा समूह चेतना प्रतिबिबित होती है | जिसमे किसी समुदाय के विश्वास छिपे रहते हैं | इसं विश्वासों में से अनेक लुप्त हो जाते हैं तथा अनेक पुनर्जीवित किये जाते हैं | अतः कलाकार के लिए जीवित परम्परा ही महत्त्व पूर्ण है | जो वर्तमान के सन्दर्भों से तात्कालिक का सीधा सम्बन्ध जोड़ती है | आधुनिक सन्दर्भों में उसी परम्परा की पुनः व्यवस्था की जाती है | ऐसी स्थिति में अतीत और वर्तमान एक दुसरे में पूर्णतः विलीन होकर नए अर्थों की सृष्टि और भविष्य का मार्ग बनाती हैं |

जब हम किसी देश की कला का नाम लेते हैं तो सहसा हमें उस देश की कला की प्राचीन परम्न्प्राओं का स्मरण हो उठता है | देश व् जाति की  कठोर सीमायें कला में बहुत उदार हो जाती हैं | जैसे भारतीय कला में फारस की कला के तत्वों का मिश्रण हुआ है चीन तथा जापान की कलाओं पर भारतीय कला का व्यापक प्रभाव है | अपने देश से भिन्न भिन्न अन्य महत्त्व पूर्ण परम्पराओं का भी उपयोग महान प्रतिभाशाली कलाकार सदेव करते आये हैं | वाह्य प्रभावों को आत्मसात करके भी कला में केवल वे ही प्राचीन परम्पराएँ अपना आस्तित्व बनाये रख पाती हैं जो अत्यंत शक्तिशाली होती हैं | तथा जिनमे चिर स्थायित्व तथा प्रगतिशीलता के लक्षण विद्यमान होते हैं कलाकारों को सदैव नए प्रयोग करते रहने चाहिए एवं रूढ़ियों से दूर रहना चाहिये|

एक युग था जब पृथ्वी के अलग अलग भू भागों में अलग अलग समाज अपना आस्तित्व रखते थे उनकी सबकी अपनी अलग अलग परम्पराएं थीं | किन्तु अब वे एक दुसरे के निकट आ रहे हैं | उनकी परम्पराओं की भिन्नताएं समाप्त  हो रही हैं |  तब किसी स्थान के चैतन्य कलाकार रूढ़ियों में निबद्ध नही रह सकते | इस प्रकार का परिवर्तन हो जाने के बाद भी किसी देश की कला की आत्मा परम्परा के प्रभाव को सार रूप में बनाए रखती है |

भावों तथा विषयों के अतिरिक्त परम्परा का अर्थ रचना प्रक्रिया से सम्बंधित हैं | कला की रचना प्रिक्रिया में अनिवार्य रूप से रचना के तत्व विद्यमान रहते हैं | कलाकार जिस सामग्री का प्रयोग करता है वह कला में परम्परागत रूप से पूर्व से ही प्रचलित होती हैं एवं समाज के सदस्य उससे परिचित होते हैं | इस प्रकार रचना प्रिक्रिया की दृष्टि से कलाकार परंपरा द्वारा नियंत्रित रहता है | अपर कोई भी कलाकार किसी भी सामग्री तथा रचना प्रिक्रिया को ज्यों का त्यों दूसरों की भांति ग्रहण नही करता | वह उसमे भी नवीन प्रयोग करता है |

रचना प्रिक्रिया अनिवार्य रूप से परम्परा को अप्रत्यक्ष रूप से गरहन करने की योग्यता तथा अनुभव के नए क्षेत्रों का विचित्र संयोग है | इस प्रकार परम्परा तथा आधुनिक में कोई विरोध नही है | कला ऐसी आध्यात्मिक ऊर्जा पर जीवित रहती है जिसके सहारे जीवन में निस्तेज तथा निरुत्साही तत्व को वह न केवल निगल जाए बल्कि उसका कायांतरण भी कर दे |

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