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कला और व्येक्तिकता

कला के सन्दर्भ में व्येक्तिकता के दो पक्ष हैं एक कलाकार का और दूसरा दर्शक का | कलाकार का बाहरी रूप भौतिक कलेवर में सीमित रहता है | इस भौतिक कलेवर तथा अभिव्यक्ति की भाषा की अनुभूति भी कलाकार को अपने विशेष रूप में होती है तथा कृति की रचना भी विशेष रूप में की जाती है |

कला के सन्दर्भ में व्येक्तिकता के दो पक्ष हैं एक कलाकार का और दूसरा दर्शक का | कलाकार का बाहरी रूप भौतिक कलेवर में सीमित रहता है | इस भौतिक कलेवर तथा अभिव्यक्ति की भाषा की अनुभूति भी कलाकार को अपने विशेष रूप में होती है तथा कृति की रचना भी विशेष रूप में की जाती है |

जिसके कारण कृति में मौलिकता आती है | इसका सीधा सम्बन्ध कलाकार के व्येक्तिकता से होता है | चूँकि कलाकार सृष्टा व् कल्पनाशील व्यक्तित्व का स्वामी होता है अतः वह परम्परा की अनुकृति  नहीं करता | वह प्रचलित कलात्मक माध्यम को अपने आंतरिक व्यक्तित्व के सांचे में ढाल कर नवीन रूप देता है , इस गुण को कुछ विद्वान “प्रतिभा” का नाम देते हैं | इसे प्रायः जमजात गुण माना जाता है किन्तु अब यह समझा जाने लगा है किन इस गुण का कुछ अंश ही जन्मजात होता है |

अधिकाँश रूप से इसकी उपलब्धि जीवन में ही प्राप्त की जाती है | इस विचार का केवल यही अर्थ है कि कलाकार किसी कलातमक माध्यम के प्रति आरम्भ से ही अधिक संवेदनशील होता है और उसी को अपने व्यक्तित्व के साथ सम्बंधित करने का प्रयत्न करता है | शनैः शनैः उसकी व्यक्तिगत शैली का विकास होता है | आरम्भ में वह अन्य कलाकारों की अनुकृति का प्रयास करता है , फिर धीरे धीरे माध्यमों की बारीकी समझते हुए अपना एक निजी ढंग विकसित कर लेता है | जब कलाकार निजी ढंग या शैली में मौलिकता लाने का प्रयास करता है तो इस स्थिति में उसका प्रारंभिक स्वभाव समाप्त नही हो पाता  है |

इसी से यह समझना चाहिए कलाकार की कृति में अनायास और सयास दोनों प्रकार से आती है | यह कृति की सम्पूर्णता और विवरणातमकता दोनों में हो सकता है | मानसिक दृष्टि से रूप योजना रंगों का प्रभाव कल्पनाशीलता दृश्ययोजना कुंठारुचि तीव्र और खंडित गति संतुलित और असंतुलित संयोजन इत्यादि में कलाकार की व्यक्तिगत विशेषता दृष्टिगोचार होती है | इस प्रकार यह कला कार के आतंरिक तथा बाहरी सम्पूर्ण व्यक्तित्व के कलाकृति में निहित होने पर निर्भर करती है |

कलाकार जब किसी कृति की रचना करता है तो वह उसमे अपनी अनुभूति को ही महत्त्व देता है और कृति निर्माण में पूर्व उपलब्ध अनुभवों के अधार पर ही अग्रसर होता है | यह कलाकार की आधार भूत व्यक्तिगत विशेषता है ,यदि वह अपने अनुभवों के साथ साथ दूसरों के अनुभवों से सामी स्थापित नहीं करेगा तो कला का सम्प्रेषण नही हो सकेगा | इस इस प्रकार समझना चाहिए कि –

प्रत्येक मनुष्य में किसी जाति या वंश से सम्बंधित होने के कारण कुछ प्रवृत्तियां एक सामान होती हैं किन्तु बहुत असमान भी | व्यवहारिक जीवन की ये भिन्नताएं कल्पना के सहयोग से कालानुभाव के समय कम ही हो जाती हैं | कलाकार मुख्यतः अपनी प्राथमिक प्रव्रत्तियों के आधार पर ही कलाकृति का ताना – बाना बुनता है | इनके सहारे कल्पना में अन्य प्रवृत्तियां भी स्वतः क्रियाशील हो जाती हैं अतः प्राथमिक प्रवृत्तियों के आधार पर कलाकार के स्वाभाव की सामान्यतया कल्पना की गयी है |

अपने मन में कोई बहुत ऊँची मानसिक स्थिति की कल्पना कर सकता है पर दूसरों के लिए वह अज्ञेय ही बना रह सकता है | कलाकृति को यदि नहीं समझा जा सका तो वह सम्प्रेश्नीय नहीं रहेगी अतः यह आवश्यक है किकलाकार एक निश्चित सामान्य स्तर तक अवश्य पहुंचे किन्तु इसके साथ ही कला कृति में एक नवीनता और भिन्नता बनी रहेगी , जो कलाकार की व्येक्तिकता को सुरक्षित रखती है |

कलासृष्टि के उपरोक्त व्यक्तिवादी पक्षों पर विचार करने के बाद यह प्रतीत होता है कि कलाकृति की रचना पूर्णतः व्यक्तिगत वस्तु है , और उसका आस्वादन भी पूर्णतः व्यक्तिगत है | इस दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पर यह व्यक्तिवादी कला पूर्ण सत्य नहीं है | अन्य व्यक्तियों की भांति कलाकार भी इसी संसार का प्राणी है उसकी क्षमताएं भी सीमित हैं | वह जो कुछ भी करता है उसमे दूसरों का सहयोग अनिवार्य तत्व के रूप में विद्यमान रहता है | वह जिस कलात्मक पद्धति को सीखता है वह भी दुसरे कलाकारों के माध्यम से सीखता है | समाज में उसे जो कुछ भी प्राप्त हुआ है उस स्थिति से वह आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है | समाज ही उसे खड़ा होने के योग्य बनाताहै |

इससे यह पूर्णतः सपष्ट हो जाता है कि कला में व्येक्तिकता किसी अंश में ही है यह व्येक्तिकता कला का एकमात्र गुण नहीं है | वास्तव में किसी भी कृति का व्यक्तित्व दर्शकों के सहयोग से ही पूर्णता प्राप्त करता है इस प्रकार कला में व्येक्तिकता का प्रश्न एक सीमा तक ही प्रासंगिक है | उससे कलाकृति की सम्पपूर्णता का मूल्यांकन संभव नहीं है | इस विवेचना से यह स्पष्ट है किकला के आस्वादन में जो प्रिव्रत्तियां कार्य कराती हैं वे व्येक्तिक व् निर्व्यक्तिक दोनों का सम्मेश्रण हैं और व्यक्तित्व के दोहरेपन की सूचक हैं |

Prashant Tripathi
Prashant Tripathi