कला और नैतिकता

जहाँ तक कलाओं में नैतिकता का प्रश्न है वहाँ हम इसमें उसी प्रकार का सम्बन्ध पाते हैं जो कला और धर्म में है | यहाँ (कला के सन्दर्भ में नैतिकता) क्या है ? समझना जरुरी हो जाता है |

नैतिकता का सम्बन्ध नीति शास्त्र से हे जिसकी कई परिभाषाएं हैं जिन पर विचार करना न ही संभव है और न ही वांछनीय है | नीति शास्त्र का परम्परागत अर्थ “मोरिलिटी” MORALITY है | जो लैटिन भाषा के “मोरस” MORES से बना है | इसका अर्थ परम्परा या प्रचालन है | अतः प्रारंभ में नीतिशास्त्र परम्पराओं अथवा प्रचालन का शास्त्र था | किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में नीतिशास्त्र को इस प्रकार परिभाषित करना उपयुक्त नही लगता है |

मानव सम्पूर्ण जीवन में जो भी कर्म करता है वह दो प्रकार के हैं | ऐच्छिक और अनैच्छिक | मानव के ऐच्छिक कर्मों पर ही किसी मानक का प्रयोग कर उसे नैतिक दृष्टि से उचित या अनुचित कहा जा सकता है | ऐच्छिक कर्म ही नीतिशास्त्र का सार हैं , अतः नीतिशास्त्र की एक उपयुक्त एवं पूर्ण परिभाषा हम इस प्रकार दे सकते कि नीतिशास्त्र मानकीय या आदर्शमूलक विज्ञानं है जो मानव के ऐच्छिक कर्मों के उचित अनुचित रूप में मूल्यांकन के लिए मापदंड बतलाता है |

कुछ लोग कला के सामान नीत्तिशास्त्र को भी कला ही मानते हैं , किन्तु ऐसा मानना भूल है | इन दोनों का क्षेत्र नितांत भिन्न है | कला का सम्बन्ध रचनात्मक या सृजनात्मक क्रिया से है | और नीति शास्त्र का सम्बन्ध ज्ञानात्मक पहलू से है | कला के ज्ञानात्मक या सृज्नातक होने से इसे जन्मजात माना जाता है जबकि नीतिशास्त्र ग्यानाताम्क होने से अत्र्जित किया जाता है | कलाकृति का मूल्यांकन वाह्य है किन्तु नैतिकता का मूल्यांकन वाह्य नही है |

नीति और कला में अंतर है किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नही है कि यहाँ नितांत विरोध है , कला एक शक्ति है सामर्थ्य है जो अधिकतर जन्म जात होती है यह बात अलग है कि कला कार जन्म से हो सकता है किन्तु कला का मूल्यांकन करना हम जन्म से ही नहीं जान सकते | अस्तु

नीतिशास्त्र एवं सौन्दर्यशास्त्र दोनों का सम्बन्ध आदर्श की विवेचना से है | सौंदर्यशास्त्र सौन्दर्य के प्रतिमानों की विवेचना करता है | और नीतिशास्त्र कल्याण की दृष्टि से हमारी चेष्टाओं एवं कर्मों के महत्त्व का विचार करता है | प्राचीन यूनानी दार्शनिक ‘कालोन’ के नाम से सुन्दर एवं नैतिक सज्जनता का बोध होता है | यूनानी दार्शनिक नैतिक और सुन्दर में भेद नही कर पाते थे |

कालिदास प्रो . हर्बर्ट .सेफ्त्सब्री, रस्क्किन, गेटे, हेनरी मूर , टालस्टाय आदि विद्वान कला में नैतिकता का होना परम आवश्यक मानते हुए सौन्दर्य शास्त्र का एक अंग स्वीकार करते थे | ये सभी विद्वान कला में नैतिकता के पक्षधर थे , और कलाओं का धार्मिक होना आवश्यक समझते थे |

कलाओं का अधिकांश  भाग सुन्दर रूप और सुन्दर रूप का श्रृंगार पक्ष से विशेष सम्बन्ध रहा है ,यही कारण है कि कलाकार सदैव ही श्रृगार परक सौन्दर्य के अंकन में विशेष रूचि लेते हैं | शारीरिक सौन्दर्य भी उनका एक लक्ष्य रहा है | उन्होंने नग्न शरीर विशेषतः नारी अंकन प्रचुरता से किया है | यही अंकन अनैतिक माना जा सकता है | चूँकि कलाकार इस दृष्टि से समझौता नही करना चाहते अतः वह नैतिकता को कला से पृथक मानते हैं | आस्कर्वाइल्द के अनुसार कला को नैतिक अथवा अनैतिक कहना निरर्थक है | इस दोनों के अपने अलग अलग क्षेत्र हैं |

श्री रिचर्ड्स ने कला और नैतिकता का तात्विक विश्लेषण इस प्रकार किया है – “नैतिकता का अर्थ पुलिस अथवा पुजारी से है और आलोचक का कार्य केवल कला को देखना है | परन्तु पुलिस अथवा पुजारी का कार्य नैतिकता की दृष्टि से इतना घटिया है और इसमें इतने अंतर्विरोध रहते हैं कि उनके प्रभाव सामाजिक मूल्यों पर कम पड़ते हैं , इन्हीं के कारण हम यह सोचने पर वाध्य होते हैं कि कलाओं में नैतिकता की कोई स्थिति नहीं है |

उपरोक्त विवेचन से यही स्पष्ट हो पाता है  कि नैतिक एवं अनैतिक का विवाद सुलझाना आसान नही है | इस प्रश्न के सन्दर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि हमारी आत्मा क्या कहती है और कला के सन्दर्भ में निश्चय ही कला और नीति का सम्बन्ध है | यह सम्बन्ध ही सिद्ध करता है कि कला और नैतिकता में अंतर तो है किन्तु यहाँ विरोध आवश्यक तत्व के रूप में विद्यमान नहीं है |

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Prashant Tripathi
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