कला और समाज

किसी भी कलाकृति के निर्माण के समय जो क्रिया उत्त्पन्न होती है , उसका सम्बन्ध कलाकार के मन और चेतना से होता है |

तब फिर कला कार का समाज से क्या सम्बन्ध होता है ?

कला के सामाजिक पक्षपर विचार करने वाले विद्वानों ने इस प्रश्न के उत्तर  दो प्रकार से दिए हैं | एक तो यह है कि नैतिकता के नाते कलाकार अपने जिस अनुभव को महत्त्वपूर्ण मानता है , उसमे वह दूसरों को भी अपने अनुभव में भागीदार बनाना चाहता है | दूसरा तर्क यह है कि कलाकार अपनी आजीविका हेतु अपनी कृतियों का सृजन करता है | इस दोनों तर्कों से यही सिद्ध होता है कि या तो कलाकार समाज का सेवक है , या अपनी कृति का विक्रेता |

विचार मंथन के बाद उपरोक्त दोनों ही तर्क कलात्मक नही है  |

क्योंकि जो वस्तु कलाकार द्वारा समाज  को प्रदान की जाती है ,बह कलाकार का अपना विशिष्ट अनुभव होता है | इस अनुभव को  जो विचारक एक अभिव्यक्ति मानते हैं , उनके अनुसार कलाकृति को भौतिक रूप की आवश्यकता नही है  | इसका उत्तर यह है कि कलात्मक अनुभव का यह रूप कलाकार की कल्पना में ही पूर्ण हो जाता है , पर कृति की रचना करते समय उस अनुभव का एक विकसित रूप ही स्पष्ट होता है | इस प्रकार कलाकार के मूल अनुभव के साथ ही कृति की रचना का अनुभव बंधा होता है | “अतः कला का किसी बाहरी माध्यम में रूप ग्रहण करना सर्वथा अकलात्मक नहीं है |

जिस प्रकार कोई संवेदना शून्य से उत्त्पन्न नही हो सकती, ठीक उसी प्रकार कलात्मक आइडिया की समृद्धि भी कलाकृति की रचना के बिना शून्य से नही हो सकती | इस दृष्टि से कलाकृतियाँ कलाकार द्वारा कल्पना में होने  वाले दृश्यमान चिन्ह हैं | ऐसे चिन्हों को समझने वाले ही कलारसिक कहलाते हैं | “अतः कला का अपना एक अलग समाज  होता है |”

कला रसिक एक साधारण कृति की तुलना में एक श्रेष्ठ कृति में अधिक रूचि लेता है | किन्तु कृति का माध्यम लचीला होने के कारण’ और ‘दर्शक के अनुभव में भिन्नता होने के कारण’ अपनी क्षमता के अनुसार किसी अर्थ तक पहुंचते हैं | कलाकृति का समाज के दुसरे लोगों से सम्बंधित होने का यह अर्थ कदापि नही है कि कलाकार पहले से ध्यान रखे कि उसे क्या बनाना है | “जो कलाकार इस प्रकार की कला में  विश्वास रखते हैं, वे पतित कला का सृजन करते हैं |”

कलाकार अपनी कृति में स्वयं को अभिव्यक्त करता है, पर स्वयं कलाकार का व्यक्तित्व समाज में से ही निर्मित होता है | कलात्मक माध्यम का जो रूप समाज द्वारा विकसित किया जाता है उसे कलाकार समाज से ही प्राप्त करता है | समाज में प्रचलित माध्यम और सामग्री का ही प्रयोग करता हैं ,पर उसके प्रयोग का ढंग अपना होता हैं | जिस प्रकार विभिन्न जन समुदाय अपनी अपनी भाषाओँ को समझते हैं , और परस्पर समझी जा सकने वाली भाषा में अपने भाव व्यक्त करते हैं ,उसी प्रकार कलाकार भी अपने माध्यम की क्षमता को समझने वाले जन समुदाय के लिए ही कला की सृष्टि करता है | “इस प्रकार कलाकार का आस्तित्व समाज से एवं कलाकृति का अस्तित्व कलाकार से होता है |”

कलाकार जिस युग में आविर्भूत होता है उस युग का चित्र उसकी कृतियों में स्वतः ही प्रतिबिम्बित होने लगता है | इस प्रभाव से वह चाहने के बाबजूद भी मुक्त नही हो पता है | हम जिस युग में रहते हैं , उसका सामाजिक वातावरण हमैं प्रभावित करता है | परिवार राष्ट्र समूह इत्यादि के साथ रह कर हमीं उनके सभी क्रिया कलापों में बैग लेना पड़ता है | कलकार सामाजिक विषय वास्तु से प्रेरित होता है | और उसे मूलभूत मानवीय मूल्य तथा अनुभव प्रदान कर सार्वभौम बनाता है | “इस प्रकार कलाकार औसत से हट कर पूर्ण की और अग्रसर होता है |”

कला को सामाजिक स्वप्न भी कहा गया है | किन्तु कला और स्वप्न में भेद है | स्वपन व्यक्तिगत होता है ,जबकि कला सामाजिक होती है | कला सृजनाताम्क है स्वप्न नहीं | स्वपन में श्रम नही होता  , स्वप्न गत प्रिवृत्तियां सुसुप्त रहती हैं | कलात्मक प्रिवृत्तियां जागरूक होती हैं | स्वपन में प्रिवृत्त्यों के अनुसार यथार्थ का रूप बदल जाता है कला में हम यथार्थ के अनुसार प्रिवृत्तियों का संस्कार करते है | “अतः कला समाज के लिए परम आवश्यक है | यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति की आधारभूत आवश्यकता को पूर्ण करने का मार्ग दर्शाती है |”

यह कलाकार के कार्य की सामाजिक मान्यता है | अतः कला का अस्तित्व सामाजिक है | जिस प्रकार की सामाजिक विकास की परिस्थितियाँ होती हैं , वैसे ही समाज की विचारधारा बनती है | और उसी के अनुसार लोगो के मन में बिम्ब उभरते हैं ये बिम्ब ही कला रूपों की प्रेरणा बनते हैं |

%d bloggers like this: